माओ के चीन ने अभी हाल ही में अपनी साठवीं सालगिरह मनायी.. पूरा विश्व देखा.. वो जो दिखाना चाह रहा था.. अपनी ताकत का प्रदर्शन पूरी शक्ति से किया.. करोड़ों रुपया खर्च किया.. इस समारोह में.. और इसे देखने के लिए हजारों मेहमान उपस्थित थे.. जिन्होने परेड भी देखी और तारीफ भी की.. लेकिन इस समारोह में जिसे शामिल होना था वो कहीं दुबक कर बैठे थे.. .ये वही लोग है जिनकी मेहनत की वजह से आज चीन अपने को विकासशील से विकसित राष्ट्र बनाने की ओर अग्रसर है.. हम बात कर रहे हैं चीन की आम जनता की.. ऐसा नहीं था कि वो अपने मर्जी से अपने देश के इस राष्ट्रीय पर्व में शामिल नही हुई.. उसके शामिल ना होने का कारण वो आदेश था.. जिसे वहां के शासको ने दिया था कि कोई भी व्यक्ति घर से बाहर नहीं निकलेगा.. नहीं तो गोली मार दी जायेगी.. लोग अपने घरों में दुबके रहे मारे डर के यहां तक कि उन्होने अपने घरों की खिड़कियां भी नही खोली.. घर से बाहर ना निकलने का कारण दिया था वहां के शासको ने सुर&... ये कैसी आजादी की वर्षगांठ थी जिसमें उस देश की आम जनता ही शामिल नहीं हो पायी.. क्या इसी को आजादी कहते हैं जहां पर मनावाधिकार का हनन हो रहा है... अब यच्छ प्रश्न यह उठता है कि... चीन में आजाद कौन है.. वहां की आम जनता.. या वहां के प्रशासक
राम गोपाल द्विवेदी
संप्रति - टीवी पत्रकार
Friday, October 9, 2009
Subscribe to:
Posts (Atom)